सिकन्दरसिकन्दर की आफर मुर्तज़ा in story

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                                          सिकन्दरसिकन्दर की आफर मुर्तज़ा 



के लिए किसी नेअमत से कम न थी । अब्दुर्रहमान हमदानी बहुत दिनों से यह कम्पनी सिकन्दर के नाम से शुरू करने का सोच रहे थे और सिर्फ उसके एमबीए मुकम्मल होने के इन्तिज़ार में थे । बाक़ी इन्तिज़ाम तो मुकम्मल न थे । सिकन्दर समझदार लड़का था मगर यह बात रहमान साहब भी जानते थे कि उम्मीद के खिलाफ हालात में उसके हाथ पांव फूल जाते थे । पूना की उस मीटिंग के लिए उन्होंने सिकन्दर को बहुत ब्रीफकरके भेजा था मगर सिर्फ एक फाइल होटल के कमरे में रह जाने में उसके सारे कान्फिडेन्स को पानी का बुलबुला बना दिया था । ऐसे में मुर्तजा के वक़्त पर फैसले और अकुलमन्दी से सूरतहाल संभालने मे इस साल का सबसे बड़ा कान्ट्रेक्ट खोने से बचा लिया था । वह मुर्तजा से बहुत खुश थे और नई कम्पनी अपने बेटे के हवाले करने से पहले उन्होंने सिकन्दर से मुकम्मल मशवरा के बाद यह फैसला किया था कि वह मुर्तजा को यह आफर दे । फिर सब कुछ इतनी तेजी से बदला था कि हर देखने सुनने वाला मुंह में उंगली दाबे रह गया था । फम्पनी के शुरूआती कामों और काग़ज़ात के चक्कर में वह दिनों घर से गायब रहता । रात गए घर लौटता भी तो बस सोने आता उठ कर कपड़े बदलता और एक बार फिर चौखट पारकर जाता । उस पर धुन सवार हो गई थी । उस एक मौके ने उसे और भी एक्टिव कर दिया था । कारोबारी गुर उसने दिनों में सीख लिए की आफर मुर्तज़ा के लिए किसी नेअमत से कम न थी । अब्दुर्रहमान हमदानी बहुत दिनों से यह कम्पनी सिकन्दर के नाम से शुरू करने का सोच रहे थे और सिर्फ उसके एमबीए मुकम्मल होने के इन्तिज़ार में थे । बाक़ी इन्तिज़ाम तो मुकम्मल न थे । सिकन्दर समझदार लड़का था मगर यह बात रहमान साहब भी जानते थे कि उम्मीद के खिलाफ हालात में उसके हाथ पांव फूल जाते थे । पूना की उस मीटिंग के लिए उन्होंने सिकन्दर को बहुत ब्रीफकरके भेजा था मगर सिर्फ एक फाइल होटल के कमरे में रह जाने में उसके सारे कान्फिडेन्स को पानी का बुलबुला बना दिया था । ऐसे में मुर्तजा के वक़्त पर फैसले और अकुलमन्दी से सूरतहाल संभालने मे इस साल का सबसे बड़ा कान्ट्रेक्ट खोने से बचा लिया था । वह मुर्तजा से बहुत खुश थे और नई कम्पनी अपने बेटे के हवाले करने से पहले उन्होंने सिकन्दर से मुकम्मल मशवरा के बाद यह फैसला किया था कि वह मुर्तजा को यह आफर दे । फिर सब कुछ इतनी तेजी से बदला था कि हर देखने सुनने वाला मुंह में उंगली दाबे रह गया था । फम्पनी के शुरूआती कामों और काग़ज़ात के चक्कर में वह दिनों घर से गायब रहता । रात गए घर लौटता भी तो बस सोने आता उठ कर कपड़े बदलता और एक बार फिर चौखट पारकर जाता । उस पर धुन सवार हो गई थी । उस एक मौके ने उसे और भी एक्टिव कर दिया था । कारोबारी गुर उसने दिनों में सीख लिए


थे । कुछ महीनों में ही उन तमाम दांव पेच को इस्तेमाल करना वह सीख चुका था जिसे समझने में लोग कई साल लगा देते हैं । इस नई कम्पनी ने शुरूआत में ही मार्किट में एक नाम बनाना शुरू कर दिया था जो यकीनन एक ज़हीन और पुरजोश नौजवान की मेहनत का नतीजा था । यह खुशी की बात थी । पहले कान्ट्रेक्ट से हासिल होने वाले प्राफिट में से इन्वेस्टमेन्ट का कुछ हिस्सा अदा करने के बाद भी पैसे इतने थे कि घर जाकर वह तमाम रात यही सोचता रहा किनोटों की इस गडडी को वह कहां हिफाज़त से रखे । उसे घर का कोई कोना सेफ न लग रहा था । अगली सुबह उठते ही अपने सरहाने के कवर में छुपाई पांच पांच हजार के नोटों की सुनहरी गडडी लिए वह मरियम के पास जा पहुंचा था । मरियम की नीन्द में डूबी आंखें इतने सारे रुपये एक साथ देख कर तकरीबन उबल पड़ी थी । और मुर्तज़ा उसके रिएक्शन पर मज़ा लेते हुए जी भर कर हंसा या । ऐसे में बैंक एकाउन्ट ज़रूरी था । फिर एकाउन्ट भी खुल गया और हर महीने उसकी गिनती में बढ़ने लगा । घर का हर शरस खुशी से तकरीबन दीवाना हो चला था । हालात ठीक होते ही सबसे पहले उसने घर देखना शुरू किया था । और सिर्फ चार महीने में ही एक साफ़ सुथरे इलाके में आठ कमरों वाला घर खरीद लिया था । घर डबल स्टोरी था । चार कमरेनीचे और चार ऊपर । खूबसूरत रंग वाले इस घर में सफेद मार्बल के फर्श थे । खुले खुले कमरों में चाक की



छतें और ख़ूबसूरती बढ़ा रही थी । जिस रोज़ रखशिन्दा और करीम को • यह घर दिखाने लाया हैरत से उनकी आंखें फट गई थीं । हालांकि यह कोई बहुत बड़ा बंगला न था मगर दो कमरों वाले तंग डरखे के मुकाबले में यह महल ही लग रहा था । नए घर में कुर्सियों , दीमक लगे पलंगों का कोई काम न था इसलिए मुनासिब सा जरूरी फर्नीचर भी खरीद लिया गया । घर खरीदने के लिए कम पड़ने वाले पैसे सिकन्दर ने दिए थे । पार्टनर होने से पहले वह अच्छे दोस्त थे इसलिए सिकन्दर की तरफ से खर्च होने वाले पैसों को मुर्तज़ा की सहूलत के मुताबिक वापस करने की भी आफ़र थी । सब कुछ सैट हो गया था । अच्छा घर , अच्छा खाना , ख़ूबसूरत बदन पर कपड़े , इन्सान इन्हीं चीज़ों के लिए मेहनत करता है । घर बदलने से जहां मरियम बहुत खुश थी वहीं मुर्तजा के अलग हो जाने , दूर चले जाने पर वह बहुत परीशान भी थी । उसने जाहिर न किया लेकिन मुर्तजा समझता था । जिन नीले किवाड़ों को वह दिन में दर्जनों बार पार करती थी वह अब ताला पड़े थे । छत पर साथ वाली मुन्डेर से झुक कर वह सहन में देखती । वहां धूल उड़ाती वीरानी उसके दिल में डेरे डालने लगती ।



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