उसने करवट बदल कर फिर घड़ी को देखा in story

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                                                  उसने करवट बदल कर फिर घड़ी को देखा 


   उसने करवट बदल कर फिर घड़ी को देखा जो दोपहर का डेढ़ बजा रही थी । और सरहाने के करीब हाथ फेर कर ए.सी. का


रिमोट ढून्डना चाहा । फिर साइड लैम्प के पास वह उसे मिल गया । रिमोट से ए.सी. उसने पिछले महीने ही लगवाया था । ऐसा नहीं था कि उनके यहां दौलत की रेल पेल हो गई थी । उसने अम्मां अब्बा के कमरे में एक ए.सी. लगवाया था । दूसरा अपने कमरे में । मनज़ा और काशिफ भी रखशिन्दा के कमरे में ही सोते थे । अब इतनी भी रईसी नहीं आई थी कि वह हर कमरे में ए.सी. और टीवी लगवा देता । हां बस इतना हुआ था कि करीम की थोड़ी आमदनी में जिस घर का गुज़ारा खींच तान कर होता था और कोई ज़रूरत पूरी करने के लिए किसी वक्त पेट भी काटना पड़ता था आज कम से कम खाने पीने के लिए हाथ तंग न था । कमरा ठन्हा हो चुका था और हल्की सी नीन्द की हालत में दूधिया रंगत वाली रूहा उसे याद आ रही थी । वह रात को ही मुम्बई से वापस आया था । आफिस के काम से एक सेमीनार में शामिल होने वह और सिकन्दर मुम्बई गए थे । मुम्बई में उन्होंने ताज जैसे महंगे होटल में पूरे चार दिन गुज़ारे । उस लग्ज़री कमरे का फर्नीचर , कारपेट और इन्टीरियर देखने से तअल्लुक रखता था । मुर्तजा पहली बार एलयीट क्लास के किसी होटल में ठहरा था । उसे एक एक चीज़ इम्प्रेस कर रही थी । रोज़ बेड शीट और कुशन कवर्ज बदले जाते । मोटे कारपेट को वेक्यूम क्लीनर से साफ़ करने वाला क्लीनर एक्टिव था । दून्डने पर भी कमरे में धूल का एक जर्रा तक दिखाई न देता था । यहां तक कि बाथरूम इस क़दर चमक रहा होता कि उसके फर्श और दीवारों पर उसे अपना अक्स नज़र आता । एक से बढ़ कर एक इम्पोर्टेड शेम्पू , साबुन और





शेविंग का सामान वहां रहता था । इन चार दिनों में मुर्तजा को गुमान हुआ वह किसी रियासत का राजा है । चौथे रोज़ ज़रूरी काम निपटा कर वह शाम के वक्त समन्दर के किनारे पर चले गए थे । सूरज डूबने का इससे खूबसूरत मन्ज़र मुर्तजा ने कभी नहीं देखा था । किनारे की गीली रेत पर चलते चलते मुस्कुराते हुए यह सोचने लगा कि अगर मरियम होती तो वह झाग जैसे पानी की लहरों को भाग भाग कर अपने पैरों से लिपटता देख कर खुशी से दीवानी ही हो जाती । चलता चलता वह दूर आ गया था । सिकन्दर की आवाज़ पर उसने मुड़ कर देखा वह उसे बुला रहा था । सिकन्दर की एक कज़िन उसे वहां इत्तिफ़ाक़ से मिल गई थी और वह ख़ासा खुश था । मुर्तज़ा का भी उससे इन्ट्रोडक्शन हुआ । ख़ूबसूरत स्टाइलिश सी दो लड़कियां बड़ी फेंकली उससे मिलीं । शायद उनमें हाथ मिला कर हैलो कहने का रिवाज आम था । मगर मुर्तज़ा जैसे शख़्स को बहुत अजीब सा लगा । सिकन्दर अपनी कजिन के साथ चलता हुआ दूर निकल गया । वह उसी बेपरवाई से उससे छोटी छोटी बातें कर रही थी । रूहा सिकन्दर की कज़िन इफरा की फ्रेन्ड और क्लासमेट थी । और कल ही दोनों एक फैशन शो में मुम्बई आई थीं । वह फेशन डिज़ाइनिंग की स्टूडेन्ट थी । रूहा बेपनाह ख़ूबसूरती की मालिक तो न थी मगर उसकी बेहद उजली गोरी बेदाग़ रंगत उसका बेपरवा अन्दाज़ और उसकी स्टाइलिश ड्रेसिंग जैसे नज़र को जकड़ लेती थी । अंग्रेज़ी बोलती रूहा कुछ ही देर में उससे फेंक होकर आप से तुम पर आ चुकी थी । मरियम के बाद यह पहली लड़की





थी जिससे मुर्तजा ने इतनी देर और इतनी ज्यादा बातें की थीं । उसे अच्छा लगा । उन चारों ने डिनर इक्टठे किया । जाते वक़्त उसने मुर्तज़ा का मोबाइल नम्बर मांग कर उसे हक्का बक्का कर दिया था । फिर . उसने सोच कर सर झटका कि जिस सोसाइटी से वह थी वहां आम बात थी । उसे नहीं पता चला वह कबसे रूहा को सोचे जा रहा था । नीन्द कब की उड़ गई थी । करवट लेकर उसने बेतुके से ख़्याल को जहन से झटका और मोबाइल निकाल कर मरियम का नम्बर डायल करने लगा । दूसरी बेल पर ही फोन उठा लिया गया । " अस्सलाम अलैकुम । " उसके बोलने से पहले ही मरियम की चहकती आवाज़ उसके कानों से टकराई । उसकी सारी तकलीफ़ जाती रही । सोच का ताना बाना टूट गया । वह मुस्कुराते हुए उठ बैठा । वह एक ही सांस में उसका हाल चाल , घर वालों की खैर खैरियत के साथ साथ आफिस रूटीन भी पूछे जा रही थी । वह मुर्तज़ा के अचानक फोन आ जाने पर बहुत खुश थी । " कितने दिन से तुमने घर का चक्कर नहीं लगाया मुर्तज़ा ! अब्बा कितना याद करते " सिर्फ चचा याद करते हैं मुझे ? " वह हंसी दबा कर शरारत से बोला । " नहीं , चचा की बेटी भी आपको सुबह शाम पाबन्दी से याद करती है । आकर मिल जाएं इससे पहले कि आपकी सूरत भी उसे भूलने लगे । " " मरियम मुर्तजा को भूल सकती है क्या ? " " मरियम तो नहीं मगर मुर्तजा शायद


मरियम को भूल सकता है । " उसके शिकवा करने पर मुर्तजा हंसा और शाम में आने का वादा करके फ़ोन बन्द करके नहाने चल दिया ।




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