story
खास रहीम से बड़े करीम थे। सारी
जिन्दगी एक परचून की दुकान पर चाकरी
करने के बाद उन्होंने किसी न किसी तरह
अपनी किराने की दुकान खोल ली थी । रसूल
नगर के चौक मेकरीम जनरल स्टोर के छोटे
से मिटे मिटे लफ्जों से सजी डरबा जैसी
चौकोर दुकान सिर्फ इतनी थी कि तीन तरफ़
की दीवारों में ऊपर तक बनीलकड़ी के खानो
से भरे मसाले, दाल,घी, चीनी और जमीन
पर धरी आटे की तीन चार बोरियों के बाद
बस इतनी जगह बच पाती कि एक ऊंचा
स्टूल रख कर उस पर बैठा जा सके।
मगरकरीम अपने कारोबार की बरतरी
अक्सर रहीम पर जताते रहते। उनका
कहना था कि उन्हें भी अब नौकरी को छोड़
कर कोई छोटा मोटा काम अपना शुरू कर
देना चाहिए। मगर पैसे के बिना यह
नामुमकिन था।
ग्यारह साल तक दोनों अपने बाप की
छोड़ी जायदाद उस छोटे से घर में रहते थे।
फिर बच्चों के बड़ा होने की वजह बता कर
सहन से एक दीवार खींच कर आधा आधा
बटवारा कर लिया गया। करीम के पांच
बच्चे थे। मुर्तजा तीसरेनम्बर पर था। उससे
बड़ी तीनों बेटियों को करीम ने जैसे तैसे
करके बिरादरी में व्याह दिया था। उसके
बाद छोटी मनज़ा और काशिफ भी सरकारी
स्कूलों में पढ़ रहे थे।
जहीन होने के साथ साथ मुर्तजा की
सोच भी बहुत ऊंची थी। वह एक ही छलांग
में अमीरी और गरीबी के बीच इस लकीर
को पार कर लेना चाहता था। रसूल नगर
की तंग गलियों में पूरा बचपन बिताने के
बावुजूद अब वह उसे जहर लगती थी।
उसका दम घुटता था। पीली ईंटों वाली
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