कमरे में बढ़ती घुटन की वजह से उसकी आंख खुल गई in story

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कमरे में बढ़ती घुटन की वजह से उसकी

आंख खुल गई


 उसने पहले ऊपर छत पर

लगे पंखे को बिजली चले जाने की वजह से

धीरे धीरे घूमने के बाद रुकते हुए देखा और

फिर दरवाजे से बाहर चढ़ आने वाले सूरज

की रौशनी पर एक नज़र डाली जिसने सहन

के साथ साथ छोटा से बरामदे का हिस्सा

भी रौशन कर रखा था। उसकी निगाह

साली पुरानी दीवार घड़ी पर पड़ी। सुबत

के नौ बज चुके थे।

आंखेमलतीवह उठ बैठी औरजोरदार


जमाई ली। यह घड़ी उसके दादा के जमाने

की थी और अभी तक साथ निभा रही थी।

उसने सरहाने रखा दुपट्टा उठा कर कन्धों

परफैलाया और बिखरेबाल समेट कर कैचर

बान्धे । पलंग के नीचे पड़ी चप्पल उड़सती

बाहर चली आई।

सबीन सहन में लगाई वाशिंग मशीन

से कपड़ों का आखिरी चक्कर निकालने के

बाद अब उन्हें खंगाल रही थी। यह उसकी

सालों पुरानी आदत थी। सुबह

ही जागने

का शौक । सिर्फ इस पर बस नहीं था बल्कि

उठते के साथ ही सारा काम निबटा कर

वह उस वक्त बिल्कुल फ्री हो चुकी होती

जब मरियम बिस्तर से उठती थी।

ऐसा नहीं था कि मरियम काहिल या

कामचोर थी बल्कि सुबह की नमाज के बाद

से नीन्द इस ज़ोर से जकड़ने लगती कि वह

में

बेबस सी फिर बिस्तर में घुस जाती। फिर

उठने के बाद वह अपने काम धीमी चाल से

ही सही मगर पूरी लगन के साथ निबटाती

थी। खाना बनाने की जिम्मेदारी मरिमय

की ही थी और बकौल रहीम के उनकी बेटी

के हाथ में वह मजा है जो उसकी मां के

हाथ में था।

मरिम वहीं सहन में लगे नल के पास

बैठ कर मुंह धोने लगी । नल के ऊपर एक

चौकोरसा छोटा शीशा और स्टेन्ड लगाया

गया था। मुंह धोने के बाद उसने स्टेन्ड के

ऊपर रखे कंधे से बाल सीधे किए और ढीली

सी चुटिया बना कर पीढ़ी पर बैठ गई और

सबीन को देखने लगी जो अब कपड़े सहन

में बन्धे तार पर फैला रही थी। उस वक्त

कपड़े कम थे वर्ना हमेशा छत पर सुखाए

जाते थे।



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