वह सर झाड़ मुंह फाड़ मिट्टी से in story

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 वह सर झाड़ मुंह फाड़ मिट्टी से



अटे सहन में बैठी रही और फालतू चीज़ों में से काम आ जाने वाली चीजें अलग कर रही थी । काग़ज़ों और फटी पुरानी किताबों को एक थैले में भर कर वह रद्दी वाले को भिजवाने का सोच रही थी । सामने वाले कमरे के साथ मौजूद छोटे से स्टोर की सफाई आज बड़े दिन के बाद की थी । इरादा तो बहुत दिन से था मगर वह सुस्ती कर जाती थी । सबीन ने किचन की सफाई पर कमर कस रखी थी । छोटे से इस घर में दो बेटियों के हाथों के सलीक़े और सुघड़ापे की गहरी छाप नज़र आती थी । कमरों में सामान की भरमार न थी इसलिए साफ सुथरा और पुर सुकून लगता था । सामने वाले कमरे में दो पलंग जिन पर कढ़ी हुई सफेद चादरें बिछी थीं ।


उनकी मां की जहेज़ का एक आईना और छोटी सी टेबिल सिंघार की और उन्हीं का पुराना ट्रंक । दूसरी तरफ कपड़ों की एक छोटी अल्मारी थी । मरियम और सबीन इस कमरे में ज़माने से सोती आई थीं । अम्मां की मौत के बाद रहीम ने ही उन्हें मां की तरह पाला था । हर ज़रूरत का ख्याल रखा । बेशक उनकी हैसियत कम थी मगर इसके मुताबिक उन्होंने अपनी बेटियों को कोई कमी न होने दी । और वह दोनों थीं भी सब्र करने वाली । रहीम का बिस्तर दाख़िली दरवाज़े के साथ वाले बाहरी कमरे में बिछा था । वहां लकड़ी की तीन फुर्सियां और एक छोटी टेबिल भी रखी थी । आने जाने वाले मेहमानों को वहीं बिठाया जाता था । इस तरह यह कमरा बैठक का काम भी देता था । सामने वाले कमरे के दाएं तरफ़ स्टोर था और छोटे से बरआमदे के बाद सहन के एक तरफ़ किचन और बाथ रूम और दूसरी तरफ दीवार के साथ एक क्यारी बनी थी । सालों पहले रहीम ने मरियम की ज़िद पर वहां जमीन खोद कर खाद डलवा दी थी और नतीजे में इतने सालों की मेहनत से शहतूत और अमरूद का एक छितनार दरख़्त छोटे से सहन पर छांव दे रहा था । मरियम ने क्यारी में सब्जी के साथ साथ मोतिया , गुलाब के पौदे लगा रखे थे । जब कभी मोतिया के फूल खिलते सारा घर भीनी खुशबुओं से महकने लगता । गुलाब से ज्यादा मोतिया के यह उजले उजले खिले हुए सफेद फूल मरियम की कमज़ोरी थे । जब भी कलियां आती तो दिन भर वह उन मुंह बन्द कलियों के नज़ारे से खुश होती रहती और शाम होते ही तोड़ कर दो फूल अपने कानों






में पहन लेती । यह फूल उसे किस्मत की देन लगा करते । जब भी खिलते मरियम के लिए कोई खुशी दस्तक देकर सहन में आ खड़ी होती । सारी फालतू चीजें ठिकाने लगा कर उसने सहन धोया और खुद नहाने घुस गई । नहा कर बाहर आई तो एक बार फिर उसकी नज़र अमरूद की तरफ लगे मोतिया पर पड़ गई । वह मुस्कुरा दी । एक पौदे पर चार पांच फूल एक साथ खिले थे और वह हमेशा की तरह अनजाने तौर पर खुशी की महक पाने के लिए इन्तिज़ार में थी । किचन के बाहर तरत पर बैठ कर वह अपने गीले बाल सुलझाने लगी । वह गीले बालों का झरने की तरह किए धीरे धीरे उन पर फंघा फेर रही थी । अचानक दरवाज़े पर होने वाली आहट पर उसने मुड़ कर देखा । मुर्तजा को आता देख कर वह खिल उठी । उसके क़दमों में तेज़ी और चेहरे पर दबे दबे जोश की लाली थी । आते ही उसने मरियम के हाथ पकड़े और उसके बिल्कुल सामने पन्जों के बल ज़मीन पर बैठ गया । मुर्तज़ा के चेहरे पर छाई लाली किसी बहुत बड़ी खुशी की ख़बर का पता दे रही थी । " बूझो मरियम ! मैं तुम्हारे लिए क्या ख़बर लाया हूं । " " आ . तुम्हारी जाब लग गई । " उसे सोचने की ज़रूरत न थी । फिर भी सोचने की एक्टिंग करते हुए बोली तो मुर्तजा खिलखिला कर हंसा । उसकी हंसी में खुशी की सनक थी । " इससे भी बड़ी बात है । तुम बूझो । " " इससे बड़ी बात क्या होगी ? लाटरी निकल आई है क्या ? "



" बस समझो लाटरी ही निकल आई है । सिकन्दर एक नई कम्पनी स्टार्ट कर रहा है और उसने मुझे चालीस परसेन्ट की पार्टनरशिप की आफ़र की है । " खुशी से उसकी आवाज़ कंपकपा रही थी । " इतनी बड़ी आफ़र ? " मरियम आंखें फाड़े उसे देखते हुए खुशी व हैरत के समन्दर में डूब गई । " हां , और वह भी बिना किसी इन्वेस्टमेंट के चालीस परसेन्ट के हिसाब से जितनी इन्वेस्टमेन्ट मेरे हिस्से में होगी वह मेरी मेहनत और काम के बदले मिलते प्राफिट में से थोड़ी थोड़ी करके अदा होती जाएगी । " उसने और मज़बूती से उसके हाथ अपने हाथों में थाम लिए जिसकी आंखें खुशी के मारे भीग सी गई थीं । " ज़िन्दगी ने मुझे खुद को जीत लेने का मौका दे दिया है मरियम ! तुम समझती होना इस पार्टनरशिप का क्या मतलब है ? बिज़नेस करने जा रहा हूं मैं । यह हम सबके दिलददर दूर कर देगा । यह मौका हम सबको इस कुएं से निकाल देगा । " वह जोश से बोलता जा रहा था । हां में सर हिलाती मरियम की भीगी आंखों से आंसू बह कर गालों को भिगोने लगे । वह अपने रब की इनायतों पर अपनी दुआओं के इस क़दर जल्द क़बूल होने पर गुंग सी बैठी थी । मुर्तज़ा की पेशानी ( माया ) पर फैली इतमीनान की ठन्ही सी छाप मरियम को रब के आगे सजदे करने पर उकसा रही थी । " तुम मुझे हिम्मत न दिलाती तो आज में यह सब न कर पाता मरियम थैंक्स क्सएलाट । " वह हकीकृत में उसका शुक्र अदा कर रहा था कि वही तो उसके लिए



इतने घुप अन्धेरे में उम्मीद की किरन , खुश उम्मीदी की रौशनी बन कर चमक रही थी ।





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