उन ही दिनों एक बहुत अच्छे घर से मरियम
उन ही दिनों एक बहुत अच्छे घर से मरियम सबीन के लिए रिश्ते आए । वह लोग अपने दोनों बेटों की शादी एक साथ करना चाहते थे । खाते पीते घराने से आया रिश्ता किसी नेअमत से कम न था । रहीम ने सोचने के लिए वक्त मांगा । उनकी फ़िक्र सही थी । दोनों बेटियां ठीक अपने घरों की
हो जाएं यही तो बस एक स्वाहिश थी उनकी । मगर मरियम के लिए कोई और रिश्ता वह सोच भी न सकते थे । यह बात बचपन से ही ढके छुपे अन्दाज़ में सब पर जाहिर थी कि मरियम मुर्तजा के लिए है । घर का हर बड़ा छोटा इस बात को जानता था इसलिए रहीम ने आने वाले रिश्ते के लिए । मरियम की राय लेना भी ज़रूरी न समझा और सिर्फ सबीन के लिए हां कर दी । सबीन के सुसराल वालों को बहुत जल्दी थी । लोगों ने बातें बनायीं कि बड़ी को छोड़ कर छोटी को ब्याह रहे हैं मगर जानने वाले अन्दर की बात भी जानते थे । इस तरह सबीन अब्दुर्रहमान शादी करके सबीन अहमद रज़ा बन कर पिया घर सिधार गई । रहीम ने अपनी सारी पून्जी निकाल कर सबीन को यह सब कुछ दिया जो उनकी हैसियत के मुताबिक था । मरियम के लिए वह दोबारा जमा कर लेंगे यह सोच कर सब कुछ सबीन की शादी पर खर्च कर दिया । ताया अव्या ने भी शादी में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था और अच्छी तरह तमाम काम निपट गए थे । मुर्तजा बहुत कम वक्त के लिए आ सका था मगर मेहन्दी से लेकर बारात तक यह तमाम फंक्शन में शामिल था । और सारा वक्त मरियम के सजे संवरे रूप को नज़रों की फेद में लिए रखा था । मरियम ने अब शाम को घरों में जाकर ट्यूशन्ज़ लेना बन्द कर दिया था । रहीम के दुकान जाने के बाद वह घर को अकेला नछोड़ सकती थी । पैसे भी अब सब कामों की जिम्मेदारी उसी पर गई थी । इसलिए यह घर में ही उन बच्चों को पढ़ाने लगी जिन्हें पहले सबीन पढ़ाती थी ।
दिन भर काम निपटा कर वह दोपहर में कुछ देर सो जाती फिर उठ कर बच्चों को पढ़ाती और फ्री होकर शहतूत के दरख़्त के नीचे कुर्सी बिछा कर घुटनों के पास बाजू लपेटे मुर्तज़ा के फोन का इन्तिज़ार करने लगी । पिछले कुछ महीनों से यह भी उसकी आदत बन गई थी । रोज़ाना के वादे के बावजूद हफ्ते में दो तीन बार वह काल ज़रूर कर लेता था मगर रोज़ इन्तिज़ार करना मरियम ने नहीं छोड़ा था । यह फोन मुर्तजा ने उसकी बर्थ डे पर गिफ्ट में दिया था । इतने महंगे गिफ्ट पर वह बजाए खुश होने के रोने बैठ गई थी । उसका दिल इतना ही छोटा था । बावुजूद खुश उम्मीदी के जब वह उम्मीद पूरी हो जाती तो उसका चिड़िया जितना दिल उसे सहार नहीं पाता था । उस वक्त भी वह छत पर कपड़े फैला कर नीचे आई थी जहां सहन में फर्श पर बच्चे अपने बैग्ज़ रखे लिखने पढ़ने में बिज़ी थे । हिसाब के किसी सवाल में उलझते हुए वह नए सिरे से हल करने लगी थी कि आहट पर चौंकी । दरवाज़े से रखुशिन्दा ताई अन्दर दाख़िल हो रही थी । साथ में मनज़ा भी थी । जबसे घर छोड़ा था उन्होंने आना बहुत कम कर दिया था । क्योंकि नया घर काफी दूर था । खुद मरियम भी घर देखने सिर्फ एक ही बार वहां गई थी । मरियम उठ कर एकदम ताई के गले जा लगी । इतने दिनों बाद उनके आने पर उसकी आंखें चमक उठी थीं । कुछ देर रखुशिन्दा खड़ी रहीं । " प्यास से हल्क में कान्टे पड़ रहे हैं । मरियम ! इतनी गर्मी में अब क्या गले से चिमटी ही रहोगी । " ताई ने उसे अलग करते हुए बेज़ारी से कहा ।
मरियम भीगी मुस्कुराहट के साथ मनज़ा से मिलने लगी । " ताई अम्मां ! आप बैठें ना में अभी शर्बन बना कर लाई । " वह किचन की तरफ भागी और जल्दी से शिकन्जी बना कर ले आई । और तख़्त पर ट्रे रखी जहां रखशिन्दा अपनी चादर फैला कर दोनों हाथों में थाम कर पंखे की तरह झल रही थीं । " तौबा कितनी गर्मी हो गई है और तेरा दिल नहीं घबराता इस तरह बिना पंखे के सहन में बैठी है । " वह हैरत से उन्हें देखने लगी जिन्होंने खुद पूरी ज़िन्दगी यूं ही सहन में पड़ने वाली सख्त गर्मी मे उस बैठे गुज़ारी थी । फिर वह मुस्कुरा दी । ताई की तबीअत वह अच्छी तरह समझती थी । " अच्छा लें आप शर्बत पिएं । मैं हाथ वाला पंखा ले आऊं अन्दर से पेडस्ट्रल फैन भी ख़राब है । " वह उठी फिर जाते जाते रुकी । उसके दिमाग ने भी काम करना बन्द कर दिया है शायद । सर पर हाथ मार कर फिर वह पलटी । " ताई अम्मां ! आप अन्दर चल कर बैठें ना पंखे के नीचे । " " नहीं , बस ठीक हूं इधर ही जा हाथ वाला पंखा ही ले आ । " सर हिलाती वह मुड़ी । कितने दिनों के बाद आने से वह खिल उठी थी । अपनों के साथ का सुख भी कितना प्यारा लगता है । ताई रखुशिन्दा गैरों की तरह तकल्लुफ़ से तख़्त पर बैठी थीं । उसे अजीब सा लगने लगा । पंखा झलते हुए वह मनज़ा से छोटी छोटी बातें पूछती रही जो उसे अपनी शापिंग
दिखा रही थी । " क्या हुआ ताई अम्मी ! पिएं ना शर्बत । " बड़ी देर से हाथ में गिलास को तूं देख कर वह बोली । " अजीब सा मज़ा है इस शर्बत का तो । " उनकी अजीब सी बात पर वह सवालिया अन्दाज़ में मनज़ा की तरफ देखने लगी । " वह . अम्मी मिनरल वाटर कह रही हैं । " तेरह साला मनज़ा ने शर्मिन्दा शर्मिन्दा से अन्दाज़ में कहा तो मरियम को ज़ोर की हंसी आई मगर बर्दाश्त करके उन्हें देखने लगी । " यह पानी मुझे डाक्टर ने मना कर रखा है । अब तो जी भी नहीं करता एक घून्ट पीने का भी । " " अच्छा ताई अम्मां ! मैं आपको बोतल मंगवा देती हूं । " अपनी तरफ से उसने बहुत मुनासिब बात की थी । " ना बाबा ना मुझे तो मुआफ़ रखो । अब दो नम्बर बोतलें पीकर मुझे अपना पेट खराब नहीं करवाना । " आराम से सर हिलाती मरियम को हंसी छुपाना बहुत मुश्किल लगने लगा तो वह द्रे उठा कर यह सोचते हुए किचन में रखने चली गई कि इन्सान चाहे कितनी ही तरक्की कर ले उसे अपने अस्त , अपने पास्ट को नहीं भूलना चाहिए । आगे की ज़िन्दगी जीने में आसानी होती है ।
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